Monday, August 16, 2021

अध्याय एक - श्लोक 35 और 36

 

अपि त्रिलौक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते | 

        निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीति स्याज्जनार्दन || ३५ || 


अपि–  तो  भी;  त्रै-लोकस्य  –  तीनो लोको के;  राज्यस्य– राज्य के;  हेतोः–   विनिमय  में;  किम्नु–  क्या कहा जाय;  मही–कृते–  पृथ्वी  के लिए;  

निहत्य–  मारकर;  धार्तराष्ट्रान्– धृतराष्ट के पुत्रों को;  –नः  हमारी;  का–  क्या;  प्रीतिः–  प्रसन्ऩता;  स्यात्–  होगी;  जनार्दन–  हे जीवों के  पालक ।


हे जीवों के पालक ! मैं इन सबों से लडने को तैयार नहीं, भले ही बदलेे मै मुझे तिनों लोक क्यों न मिलते हों, इस पृथ्वी की तो बात ही छोड दे । भला धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें कौन सी प्रसन्नता मिलेगी ? 




पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः  | 

तस्मान्नार्हा  वयं  हन्तुं  धार्तराष्ट्रान्सबान्धवान् 

     स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव  ||  ३६  || 


पापम्  -  पाप;  एव–  निश्चय  ही;  आश्र्येत–  लगेगा;  अस्मान–  हमको;  हत्वा–  मारकर;  एतान्–  इन सब; आततायिनः–  आततायियों  को; 

तस्मात्–  अतः;  –  कभी नहीं;  अर्हाः–  योग्य;  वयम्–  हम;  हन्तुम–  मारने के लिए;  धार्तराष्ट्रान–  धृतराष्ट्र के पुत्रों  को;  स-बान्धवान्–  उनके मित्रों सहित;  

स्व-जनम्–  कुटुम्बियों को; हि–  निश्चय  ही;  कथम्–  कैसे;  हत्वा–  मारकर;  सुखिनः–  सखी;  स्याम–  हम  होंगे;  माधव–  हे लक्ष्मीपति कृष्ण ।  


यदि  हम  ऐसे  आततायियों  का  वध  करते  हैं  तो हम  पर पाप  चढेगा,  अतः  यह उचित नहीं  होगा कि  हम धृतराष्ट्र  के  पुत्रों  तथा  उनके  मित्रों  का  वध  करें  ।  हे  लक्ष्मीपति  कृष्ण!  इससे  हमे  क्या  लाभ  होगा ?  और अपने ही  कुटुम्बियों  को  मार कर हम  किस  प्रकार सुखी  हो  सकते  है ? 

Sunday, August 15, 2021

अध्याय एक - श्लोक 33 और 34

 त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च | 

        आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः || ३३ || 


ते–  वे;  इमे–  ये;  अवस्थिताः– स्थित;  युद्ध–  युद्धभमि  मे;  प्राणान्–  जीवन को;  त्यक्त्वा–  त्याग कर;  धनानि–  धन को;  –  भी;  

आचार्या– गुरुजन;  पितरः–पितृगण;  पुत्राः–  पुत्रगण;  तथा–  और;  एव–  निश्चय  ही;  –  भी;  पितामहाः–  पितामह;


मातुलाः श्र्वश्रुराः  पौत्राः  श्यालाः  सम्बन्धिनस्तथा  |  

   एतान्न  हन्तुमिच्श्छामि  घ्नतोऽपि  मधुसूदन  ||  ३४  || 



मातुलाः–  मामा लोग;  श्र्वशुराः–  श्र्वसुर;  पौत्राः–  पौत्र;  श्यालाः–  साले;  सम्बन्धिनः–  सम्बन्धी;  तथा– तथा;  

एतान्–  ये सब;  –  कभी  नहीं;  हन्तुम–  मारना;  इच्श्छामि–  चाहता  हूँ;  घ्रतः–  मारे  जाने  पर;  अपि–  तो भी; मधुसूदन–  हे मधु असुर को मारने वाले (कृष्ण) ।


हे मधुसूदन ! जब गुरुजन,  पितृगण,  पुत्रगण,  पितामह,  मामा, ससुर,  पौत्रगण,  साले  तथा  अन्य  सारे  सम्बन्धी  अपना  धन  एवं  प्राण  देने  के  लिए  तत्पर  है  और  मेरे समक्ष खडे़ है तो फिर मैं इन सबको क्यों मारना चाहुँगा,  भले  ही  वे मुझे क्यों न मार डाले ? 

Friday, August 13, 2021

अध्याय एक - श्लोक 31 और 32


 न च  श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे | 

      न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राजयं सुखानि च || ३१ ||


  – न तो;  –  भी;  श्रेयः– कल्याण;  अनुपश्यामि–  पहले  से  देख रहा  हुँ;  हत्वा– मार कर;  स्वजनम्– अपने सम्बन्धियों को;  आहवे– युद्ध मे;  

– न तो;  काङ्क्षे–  आकांक्षा करता हुँ;  विजयम्–  विजय;  कृष्ण–  हे कृष्ण; –  न  तो;  –  भी;  राज्यम्–  राज्य; सुखानि–  उसका  सुख;  –  भी 


हे कृष्ण! इस युद्ध मे अपने ही स्वजनों का वध करने से न तो मुझे कोई अच्छाई दिखती है और न, मैं उससे किसी प्रकार की विजय,  राज्य या सुख की  इच्छा रखता  हुँ ।

 


किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा  | 

      येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च  ||  ३२  || 


किम्–  क्या लाभ;  नः–  हमको;  राज्येन–  राज्य से;  गोविन्द– हे कृष्ण;  किम्–  क्या;  भोगैः–  भोग से; जीवितेन–  जीवित रहने से;  वा-  अथवा;  येषाम्–  जिनके;  अर्थे–  लिए;  काङ्क्षितम्–  इच्छित है;  नः–  हमारे द्वारा;  राज्यम्– राज्य;  भोगाः–  भौतिक भोग;  सुखानि–  समस्त  सुख;  –  भी


हे  गोविन्द!  हमें  राज्य,  सुख  अथवा  इस  जीवन  से  क्या  लाभ! क्योंकि  जिन  सारे  लोगों  के  लिए  हम  उन्हे चाहते  है ।

Thursday, August 12, 2021

अध्याय एक - श्लोक 29 और 30


 वेपथुश्र्च शरीरे मे रोमहर्षश्र्च जायते | 

        गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव  परिदह्यते || २९ || 


वेपथुः– शरीर का कम्पन;  –  भी;  शरीरे–  शरीर में;  मे–  मेरे;  रोम-हर्षकः–  रोमांच;  –  भी;  जायते–  उत्पन्न हो रहा है;  

गाण्डीवम्–  अर्जुन का धनुष, गाण्डीव;  स्त्रंसते– सरक रहा है;  हस्तात्–  हाथ  से;  त्वक–  त्वचा; –  भी;  एव–  निश्चय  ही;  परिदह्यते–  जल रही  है ।


मेरा सारा  शरीर  काँप  रहा  है,  मेरे  रोंगटे  खडे  हो  रहे  हैं,  मेरा  गाण्डीव  धनुष  मेरे  हाथ  से  सरक  रहा  है  और मेरी त्वचा जल  रही है ।




न शक्नोम्यवस्थात भ्रमतीव च मे मनः  |  

          निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव  ||  ३०  || 


–  नहीं;  –  भी;  शक्नोमि–  समर्थ  हुँ;  अवस्थातुम्–  खड़े होने में;  भ्रमति–  भुलता  हुआ;  इव–  सदृशः;  – तथा  ;  मे–  मेरा;  मनः–  मन;  

निमित्तानि–  कारण;  –  भी;  पश्यामि–  देखता  हुँ;  विपरीतानि–  उल्टा;  केशव–  हे केशी असुर को मारने वाले  (कृष्ण) ।


मै यहाँ  अब और अधिक खडा रहने मे असमर्थ हुँ । मै अपने को भूल रहा हुँ और मेरा सिर चकरा रहा है । हे कृष्ण! मुझ तो  केवल अमंगल के कारण दिख रहे है । 

Wednesday, August 11, 2021

अध्याय एक - श्लोक 27 और 28


 तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थथितान् | 

 कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् || २७ || 


तान्–  उन सब  को;  समीक्ष्य–  देखकर;  सः–  वह;  कौन्तेयः–  कुन्तीपुत्र;  सवान्–  सभी प्रकार के;  बन्धून्– सम्बन्धियों को;  अवस्थितान– स्थित;  

कृपया– दयावश;  परया– अत्यधिक; आविष्टः– अभिभूत; विषीदन्– शोक करता  हुआ;   इदम्–  इस  प्रकार; अब्रवीत–  बोला; 


जब कुन्तीपुत्र अर्जुन ने मित्रों तथा सम्बन्धियों  की  इन  विभिन्न  श्रणियों  को  देखा  तो  वह  करुणा  से अभिभूत  हो  गया  और इस प्रकार बोला ।




अर्जुन उवाच 

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्  | 

         सीदन्ति  मम  गात्राणि  मुखं  च  परिश्रुष्यति  ||  २८  ||


अर्जुनः उवाच–  अर्जुन ने कहाँ;  दृष्टवा–  देखकर;  इमम्–  इन सारे;  स्वजनम्–  सम्बन्धियों  को;  कृष्ण–  हे कृष्ण;  युयुत्सुम्–  यद्ध की  इ्च्छा रखने वाले;  समुपस्थितम–  उपस्थित;  

सीदन्ति–  काँप रहे  है;  मम्–  मेरे; गात्राणि–  शरीर के अंग;  मुखम्–  मुँह;  –  भी;  पिरशुष्यति–  सुख  रहा  है ।


अर्जुन ने कहाँ – हे कृष्ण! इस प्रकार युद्ध की इच्छा रखने वाले मित्रों तथा सम्बन्धियों  को अपने समक्ष उपस्थित  देखकर मेरे शरीर के अंग काँप रहे है और मेरा मुँह सुखा जा रहा है । 

अध्याय एक - श्लोक 25 और 26


 भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् | 

           उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरुनिति || २५ ||


भीष्म– भीष्म पितामह; द्रोण– गुरु द्रोण; प्रमुखतः– के  समक्ष;  सर्वेषाम्– सबों  के;  –  भी;  महीक्षिताम्– संसार भर के राजा;  

उवाच–  कहा;  पार्थ– हे पृथा के  पुत्र;  पश्य–  देखो;  एतान्– इन सबों  को;  समवेतान्– एकत्रित;  कुरुन–  कुरुवंश के सदस्यों  को;  इति–  इस  प्रकार ।


भीष्म,  द्रोण  तथा  विश्र्व  भर  के  अन्य  समस्त राजाओं के  सामने  भगवान  ने  कहाँ  कि हे  पार्थ!  यहाँ  पर एकत्र सारे  करुओं को दखो ।




तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः  पितृनथ  पितामहान  | 

आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पौत्रान्सखींस्तथा  | 

      श्र्वशुरान्सुहृदश्र्चैव  सेनयोरुभयोरपि  ||  २६  || 


तत्र–  वहाँ;  अपश्यत्–  देखा;  स्थितान–  खड़े;  पार्थ–  पार्थ ने;  पितृन–  पितरो को;  अथ–  भी; पितामहान–  पितामहों को;  

आचार्यान्–  शिक्षकों को;  मातुलान्–  मामाओ को;  भ्रातृन–  भाइयों को;  पुत्रान्– पुत्रों को;  पौत्रान–  पौत्रों को;  सखीन्–  मित्रों को;  तथा–  और;  

श्र्वशुरान्–  श्र्वसुरों  को;  सुहृदः–  शुभचिन्तको को;  –  भी;  एव–  निश्चय  ही;  सेनयोः–  सेनाओं के;  उभयोः–  दोनो पक्षों की;  अपि–  सहित ।


अर्जुन ने वहाँ पर दोनों  पक्षों  की  सनाओं के मध्य मे अपने चाचा, ताउओं,  पितामहों,  गरुओं,  मामाओं, भाइयों,  पुत्रों,  पौत्रों,  मित्रों,  ससुरों  और  शुभचिन्तकों  को  भी  देखा ।

Tuesday, August 10, 2021

अघ्याय एक - श्लोक 23 और 24


 योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः | 

         धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेयुद्धे प्रियचिकीर्षवः || २३ || 


योत्स्यमानान्–  युद्ध करने वालों  को;  अवेक्षे–  देखुँ;  अहम्–  मै ;  ये–  जो;  एते–  वे;  अत्र–  यहाँ;  समागताः– एकत्र;  

धार्तराष्ट्रस्य– धृतराष्ट्र  के  पुत्र  की;  दुर्बुद्धे–  दुर्बुद्धि;  युद्धे–  युद्ध  मे;  प्रिय–  मगल;  चिकीर्षवः– चाहने वाले  | 


मुझे उन लोगों को देखने दीजिये जो यहाँ पर धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्र (दर्योधन) को प्रसन्न करने की इच्छा से लडने के लिए आये हुए है। 



सञ्जय  उवाच 

एवमुक्तो  हृषीकेशो  गुडाकेशेन  भारत  |  

          सेनयोरुभयोर्मध्ये  स्थापयित्वा  रथोत्तमम्  ||  २४  || 


सञ्जयः उवाव–  सजय ने  कहा;  एवम–  इस  प्रकार;  उक्त–  कहे  गये;  हृषीकेशः–  भगवान कृष्ण ने ; गुडाकेशेन–  अर्जुन द्वारा;  भारत–  हे  भारत के वशंज;  

सेनयोः–  सेनाओं  के;  उभयोः–  दोनो;  मध्ये–  मध्य में; स्थापयित्वा–  खड़ा करके;  रथ-उत्तमम्–  उस उत्तम रथ को


संजय न कहा - हे भरतवशी! अर्जुन द्वारा इस प्रकार सम्बोधित किये जाने पर भगवान कृृष्ण ने दोनों दलो के बीच में उस उत्तम रथ को  लाकर खडा कर दिया 

Sunday, August 8, 2021

अध्याय एक - श्लोक 21 और 22



 अर्जुन उवाच  

सेनयोरुभयोर्मध्ये  रथं  स्थाप्य  मेऽच्युत  |  

       यावदेतान्निरिक्षेऽहं  योद्धुकामानवस्थितान्  ||  २१  ||

    कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे || २२ || 




अर्जुन- उवाच–  अर्जुन ने कहा;  सेन्योः–  सेनाओं के;  उभयोः–  बीच में;  रथम–  रथ  मे;  स्थापय–  कृप्या खड़ा  करे;  मे–  मेरे;  अच्युत–  हे  अच्युत;  

यावत्–  जब तक;  एतान्–  इन सब;  निरीक्षे–  देख  सकूँ;  अहम्–  मै ; योद्धु-कामान्–  युद्ध  की  इच्छा रखने  वालों  को;  अवस्थितान्–  युद्धभुमि मे एकत्र;

कैः–  किन किन  से;  मया– मेरे द्वारा;  सह–  एक साथ;  योद्धव्यम–  युद्ध  किया  जाना  है;  अस्मिन–  इस;  रण–  सघर्ष,  झगड़ा के;  समुद्यमे– उद्यम या प्रयास में  | 


अर्जुन ने कहा - हे अच्युत! कृपा करके मेरा रथ दोनों सनाओं के बीच मे ले चले जिससे मे यहाँ युद्ध की अभिलाषा रखने वालो को और शस्त्रों कि इस महान परीक्षा में, जिनसे मुझे सघर्ष करना है, उन्हें देख सकुँ |

Saturday, August 7, 2021

अध्याय एक - श्लोक 19 और 20

 

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् | 

           नभश्र्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् || १९ ||


सः– उस;  घोषः– शब्द ने; धार्तराष्ट्राणाम्– धृतराष्ट्र के पुत्रों के;  हृदयानि– हृदयों को; व्यदारयत्– विदीर्ण कर दिया;  

नभः–  आकाश;  –  शभी;  पथिवीम्– पृथ्वीतल  को;  – भी;  एव– निश्चय ही;  तुमुलः–कोलाहलपुर्ण; अभ्यनुनादयन्–प्रतिध्वनित करता |


इन विभिन्न शखों की ध्वनि कोलाहलपुर्ण बन गई जो आकाश तथा पृथ्वी को शब्दायमान करती हुई धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदयों को  विदीर्ण करने लगी  |




अथ व्यवस्थितान्दृष्टवा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः  |  

प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते  धनुरुद्यम्य पाण्डवः  | 

        हृषीकेशं  तदा  वाक्यमिदमाह  महीपते  ||  २०  || 


अथ– तत्पशचात्; व्यवस्थितान्–  स्थित;  दृष्ट्वा–  देखकर;  धार्तराष्ट्रान्–  धृतराष्ट्र के पुत्रों को;  कपिध्वजः– जिसकी पताका पर हनुमान अंकित है;  प्रवृत्ते–  कटिवद्ध;  शस्त्र-सम्पाते–  वाण चलाने के लिए;  धनु–  धनुष; उद्यम्य–  ग्रहण करके;  पाण्डवः–  पाण्डुपत्र  (अर्जुन)  ने;  हृषीकेशम्–  भगवान कृष्ण से;  तदा–  उस समय;  वाक्यम्–  वचन;  इदम्–  ये;  आह–  कहे;  मही-पते–  हे  राजा  | 


उस समय हनुमान से अंकित ध्वजा लगे रथ पर आसीन पाण्डुपुत्र अर्जुन अपना धनुष उठाकर तीर चलाने के लिए उद्यत हुआ | हे राजन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्युह मे खडा देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से ये वचन कहे । 

Friday, August 6, 2021

आधाय एक - श्लोक 17 और 18

 

काश्यश्र्च  परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः | 

       धृष्टद्युम्नो विराटश्र्च सात्यकिश्र्चापराजितः || १७ ||


काश्यः–  काशी (वाराण्सी) के राजा ने;  – तथा;  परम-ईषु-आसः–  महान धनुर्धर;  शिखण्डी– शिखण्डी ने;  –  भी;  महा-रथः– हजारो से अकेले लड़ने  वाले;  

धृष्टद्युम्नः–  धृष्टद्युम्नः  (राजा  द्रुपद के पुत्र)  ने; विराटः–  विराट राजा ने; –  भी;  सात्यकिः– सात्यकि  (युयुधान,  श्रीकृष्ण के  साथी)  ने;  –  तथा;  अपराजितः–,सदा विजयी; 


महान धनुर्धर काशीराज,परम योद्धा शिखण्डी,धृष्टद्युम्न, विराट,  अजेय सात्यकि ने



    द्रुपदो द्रौपदयाश्र्च  सर्वशः पृथिवीपतः  | 

    सौभद्रश्र्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक्  ||  १८  ||


द्रुपद–  द्रुपद, पंचाल के राजा  ने;  द्रौपदया–  द्रौपदी के पत्रों  ने;  –  भी;  सर्वशः–  सभी;  पृथिवी-पते–  हे राजा;  सौभद्रः–  सुभद्रापुत्र  अभिमन्यु  ने;  –  भी;  महा-बाहुः–  विशाल भुजाओ  वाला;  शङ्खान्–  शंख; दध्मुः -बजाए;  पृथक-पृथक–  अलग  अलग 


द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र तथा सुभद्रा के महाबाहू  पुत्र आदि  सबों ने अपने-अपने शंख बजाये |

Thursday, August 5, 2021

अध्याय एक - श्लोक 15 और 16


 पाञ्चजन्यं  हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः| 

       पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः || १५ ||


पाञ्चजन्यं–  पाञ्चजन्य नामक;  हृषीकेशः–  हृषीकेश; देवदत्तम्–  दवदत्त नामक शंख;  धनम्-जयःधनञ्जय (अर्जुन धन को जीतने वाला).ने;  

पौण्ड्रम्–  पौण्ड्र नामक शंखदध्मौ–  बजाया;  महा-शङखम्–  भी्म शंख;  भीम-कर्मा–  अतिमानवीय कर्म करने वाले;  वकृ-उदरः–  (अतिभोजी) भीम ने  | 


भगवान कृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त शंख तथा अतिभोजी एवं अतिमानवीय कार्य करने वाले भीम ने  पौण्ड्र नामक शंख बजाया  | 



अनन्तविजयं राजा कुन्तीपत्रो युधिष्ठिरः  | 

           नकुलः सहदेवश्र्च सुघोषमणिपुष्पकौ  ||  १६  ||


अनन्त-विजयं–  अनन्त विजय नाम का शंख;  राजा–  राजा;  कुन्ती-पुत्रः  – कुन्ती के पुत्र;  युधिष्ठिरः– युधिष्ठिर;  

नकुलः-नकुल; सहदेवः– सहदेव ने;  च–  तथा;  सुघोष-मणिपुष्पकौ–  सुघोष तथा मणिपुष्पक नामक शंख;


हे राजन! कुन्ती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपना अनन्तविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने  सुघोष एव मणिपुष्पक शंख बजाया | 

अध्याय एक - श्लोक 13 और 14


 ततः शङ्खाश्र्च भेर्यश्र्च पणवानकगोमुखाः | 

        सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्ततुमुलोऽभवत् || १३ ||


ततः– तत्पश्चात;  शङखाः– शंख;  – भी; भेर्य–  बड़े-बड़े ढोल,  नगाड़े;  – तथा;  पणव-आनक– ढोल तथा मृदंग;  गोमुखाः– शृंग;  

सहसा– अचानक;  एव– निश्चय ही;  अभ्यहन्यन्त– एक साथ बजाये गये;  सः– वह;  शब्दः– समवेत स्वर;  तुमुल– कोलाहलपुर्ण;  अभवत्–  हो गया  |


तत्पश्चात शंख, नगाडे, बिगुल, तुरही तथा सींग सहसा एक साथ  बज  उठे । वह समवेत स्वर अत्यन्त कोलाहपुर्प  था  |



ततः श्र्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ  | 

       माधवः पाण्डवश्र्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः  ||  १४  ||


ततः–  तत्पश्चात;  श्र्वैतैः–  श्र्वेत;  हयैः–  घोड़ों  से;  युक्ते–  युक्त;  महति–  विशाल;  स्यन्दने–  रथ  में;  स्थितौ– आसीन;  

माधवः–  कृष्ण ने;  पाण्डव–  अर्जुन (पाण्डुपुत्र) ने;  –  तथा;  एव–  निश्चय  ही;  दिव्यौ– दिव्य;  शङखौ–  शंख;  प्रदध्मतुः–  बजाये  | 


दुसरी ओर से श्र्वेत घोडों द्वारा खींचे जाने वाले विशाल रथ पर आसीन कृष्ण तथा अर्जुन ने अपने अपने दिव्य शंख बजाये |  

Wednesday, August 4, 2021

अध्याय एक - श्लोक 11 और 12

 


अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः | 

        भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि || ११ ||


अयनेषु - मोचों में;    - भी;  सर्वेषु  - सर्वत्र;  यथा-भागम  - अपने-अपने स्थानों पर;  अवस्थिताः  - स्थित; 

भीष्मम्  - भी्ष्म  पितामह की;  एव  - निश्चय  ही;  अभिरक्षन्तू  - सहायता करनी चाहिए;  भवन्तः  - आप;  सर्व  - सब के  सब;  एव  हि  -  निश्चय  ही  । 


अतएव सैन्यव्यूह मे अपने-अपने मोर्चो पर खडे रहकर आप सभी भीष्म पितामह को परी-परी सहायता दें  । 




तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः  | 

सिहंनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्  ||  १२  || 


तस्य– उसका;  सञ्जयनयन– बढाते  हुए;  हर्शम् – हर्ष;  कुरु-वृद्धः– कुरु वंश के वयोवद्ध  (भी्ष्म):  पितामहः– पितामह;  

सिहं-नादम् –  सिंह की सी गर्जना;  विनद्य– गरज कर;  उच्चैः -  उ्च्च स्वर से;  शङखम् – शंख; दध्मौ–  बजाया;  प्रताप-वान्–  बलशाली  |


तब कुरुवशं के वयोवृद्ध परम प्रतापी एवं वृद्ध पितामह ने सिंह-गर्जना की सी ध्वनि करने वाले अपने शखं को उच्च स्वर से बजाया,  जिससे  दुर्योधन  को  हर्ष  हुआ | 

Monday, August 2, 2021

अध्याय एक- श्लोक 9 और 10



 अन्य  च बहवः श्रुरा  मदर्थे त्यक्तजिविताः | 

          नानाशस्त्रप्रहरणाः  सर्वे  युद्धविशारदाः  ||  ९  || 


अन्ये  - अन्य सब;    - भी;  बहवः  - अनेक;  शुराः  - वीर;  मत्-अर्थे  - मेरे लिए;  त्यक्त-जीविताः  - जीवन का उत्सर्ग करने वाले;  

नाना  - अनेक;  शस्त्र  - आयुध;  प्रहरणाः  - से  युक्त;  सर्वे  - सभी;  युद्ध-विशारदाः  -  युद्धविद्या  मे  निपुण  । 


ऐसे अन्य वीर भी हैं जो मेरे लिए अपना जीवन त्याग करने  के लिए  उद्यत हैं । वे विविध प्रकार के हथियारों से सुसज्जित है और  युद्धविद्या मे  निपुण  है । 




अपर्याप्तं तदस्माकं  बलं भीष्माभिरक्षितम्  |

   पर्याप्तं  त्विदमेतेषां  बलं  भीमाभिरक्षितम्  ||  १०  || 


अपर्याप्तं  -  अपरिमेय;  तत्  -  वह;  अस्माकमं  -  हमारी;  बलम्  - शक्ति;  भीष्म  - भीष्म पितामह द्वारा ; भिरक्षितम्  -  भलीभाँति  संरक्षित;  

पर्याप्तं  -  सीमित;  तु  -  लेकिन;  इदम्  -  यह  सब;  एतेषाम्  -  पाण्डवों की; बलम् -शक्ति;  भीम -भीम द्वारा;  अभिरक्षितम्  -  भलीभाँति संरक्षित  । 


हमारी शक्ति अपिरमेय है और हम सब पितामह द्वारा भलीभाँति  संरक्षित है, जबकि पाण्डवों की शक्ति भीम द्वारा भलीभाँति संरक्षित  होकर भी सीमित  है। 

Sunday, August 1, 2021

अध्याय एक- श्लोक 7 और 8


 अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोधं द्विजोत्तम | 

          नायका मम सैैन्यस्य संज्ञार्थ तान्ब्रवीमि ते || ७ ||


अस्माकमं  -  हमारे;  तु  -  लेकिन;  विशिष्टा  -  विशेष शाक्तिशाली  ये  -  जो;  तान्–  उनको; निबोध  -  जरा जान लीजिए, जानकारी प्राप्त कर लें,  द्विज-उत्तम  -  हे  ब्राह्मणर्श्रेष्ठ;  

नायकाः  -  सेनापति;  मम  -  मेरी;  सैन्यस्यं -  सेना के;  संज्ञा-अर्थम्  -  सूचना के लिए;  तान्  -  उन्हें;  ब्रवीमि  -  बता रहा हूं;  ते  -  आपको । 


किन्तु हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! आपकी सूचना के लिए मै अपनी सेना के उन नायकों के विषय मे बताना चाहूंगा जो मेरी सेना को संचालित करने  मे विशष रूप  से निपुण है । 





भवान्भीष्मश्र्च  कर्णश्र्च कृपश्र्च  समितिञ्जयः| 

        अश्र्वत्थामा विकर्णश्र्च सौमदत्तिस्तथैव च  ||  ८  ||

 

भवान्  - आप;  भीष्मः  - भीष्म पितामह;    -  भी;  कर्ण -  कर्ण;  -  और;  कृपः  -  कृपाचार्य;    -  तथा; समितिञ्जयः  -  सदा सग्राम-विजयी; 

अश्र्वत्थामा - अश्र्वत्थामा;  विकर्ण - विकर्ण;   - तथा;  सौमदत्ति  - सोमदत्त  का  पुत्र;  तथा  -  भी;  एव  -  निश्चय  ही;    -  भी।


मेरी सेना मे स्वयं आप, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्र्वत्थामा, विकर्ण  तथा सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा आदि है जो यचद्ध मे सदैव विजयी रहे है ।

अध्याय एक - श्लोक 35 और 36

  अपि त्रिलौक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते |          निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीति स्याज्जनार्दन || ३५ ||  अपि –  तो  भी;  त्रै-लोक...