Sunday, August 1, 2021

अध्याय एक- श्लोक 7 और 8


 अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोधं द्विजोत्तम | 

          नायका मम सैैन्यस्य संज्ञार्थ तान्ब्रवीमि ते || ७ ||


अस्माकमं  -  हमारे;  तु  -  लेकिन;  विशिष्टा  -  विशेष शाक्तिशाली  ये  -  जो;  तान्–  उनको; निबोध  -  जरा जान लीजिए, जानकारी प्राप्त कर लें,  द्विज-उत्तम  -  हे  ब्राह्मणर्श्रेष्ठ;  

नायकाः  -  सेनापति;  मम  -  मेरी;  सैन्यस्यं -  सेना के;  संज्ञा-अर्थम्  -  सूचना के लिए;  तान्  -  उन्हें;  ब्रवीमि  -  बता रहा हूं;  ते  -  आपको । 


किन्तु हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! आपकी सूचना के लिए मै अपनी सेना के उन नायकों के विषय मे बताना चाहूंगा जो मेरी सेना को संचालित करने  मे विशष रूप  से निपुण है । 





भवान्भीष्मश्र्च  कर्णश्र्च कृपश्र्च  समितिञ्जयः| 

        अश्र्वत्थामा विकर्णश्र्च सौमदत्तिस्तथैव च  ||  ८  ||

 

भवान्  - आप;  भीष्मः  - भीष्म पितामह;    -  भी;  कर्ण -  कर्ण;  -  और;  कृपः  -  कृपाचार्य;    -  तथा; समितिञ्जयः  -  सदा सग्राम-विजयी; 

अश्र्वत्थामा - अश्र्वत्थामा;  विकर्ण - विकर्ण;   - तथा;  सौमदत्ति  - सोमदत्त  का  पुत्र;  तथा  -  भी;  एव  -  निश्चय  ही;    -  भी।


मेरी सेना मे स्वयं आप, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्र्वत्थामा, विकर्ण  तथा सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा आदि है जो यचद्ध मे सदैव विजयी रहे है ।

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अध्याय एक - श्लोक 35 और 36

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