Monday, August 16, 2021

अध्याय एक - श्लोक 35 और 36

 

अपि त्रिलौक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते | 

        निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीति स्याज्जनार्दन || ३५ || 


अपि–  तो  भी;  त्रै-लोकस्य  –  तीनो लोको के;  राज्यस्य– राज्य के;  हेतोः–   विनिमय  में;  किम्नु–  क्या कहा जाय;  मही–कृते–  पृथ्वी  के लिए;  

निहत्य–  मारकर;  धार्तराष्ट्रान्– धृतराष्ट के पुत्रों को;  –नः  हमारी;  का–  क्या;  प्रीतिः–  प्रसन्ऩता;  स्यात्–  होगी;  जनार्दन–  हे जीवों के  पालक ।


हे जीवों के पालक ! मैं इन सबों से लडने को तैयार नहीं, भले ही बदलेे मै मुझे तिनों लोक क्यों न मिलते हों, इस पृथ्वी की तो बात ही छोड दे । भला धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें कौन सी प्रसन्नता मिलेगी ? 




पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः  | 

तस्मान्नार्हा  वयं  हन्तुं  धार्तराष्ट्रान्सबान्धवान् 

     स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव  ||  ३६  || 


पापम्  -  पाप;  एव–  निश्चय  ही;  आश्र्येत–  लगेगा;  अस्मान–  हमको;  हत्वा–  मारकर;  एतान्–  इन सब; आततायिनः–  आततायियों  को; 

तस्मात्–  अतः;  –  कभी नहीं;  अर्हाः–  योग्य;  वयम्–  हम;  हन्तुम–  मारने के लिए;  धार्तराष्ट्रान–  धृतराष्ट्र के पुत्रों  को;  स-बान्धवान्–  उनके मित्रों सहित;  

स्व-जनम्–  कुटुम्बियों को; हि–  निश्चय  ही;  कथम्–  कैसे;  हत्वा–  मारकर;  सुखिनः–  सखी;  स्याम–  हम  होंगे;  माधव–  हे लक्ष्मीपति कृष्ण ।  


यदि  हम  ऐसे  आततायियों  का  वध  करते  हैं  तो हम  पर पाप  चढेगा,  अतः  यह उचित नहीं  होगा कि  हम धृतराष्ट्र  के  पुत्रों  तथा  उनके  मित्रों  का  वध  करें  ।  हे  लक्ष्मीपति  कृष्ण!  इससे  हमे  क्या  लाभ  होगा ?  और अपने ही  कुटुम्बियों  को  मार कर हम  किस  प्रकार सुखी  हो  सकते  है ? 

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अध्याय एक - श्लोक 35 और 36

  अपि त्रिलौक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते |          निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीति स्याज्जनार्दन || ३५ ||  अपि –  तो  भी;  त्रै-लोक...