Friday, July 30, 2021

अध्याय एक- श्लोक 5 और 6

           

              धष्टकेतुश्र्चेकितान काशिराजश्र्च वीर्यवान| 

  पुरुजित्कुन्तिभोजश्र्च शैब्यश्र्च नरपुङ्गवः| ५ || 


धष्टकेतु: धष्टकेतु; चेकितानः - चेकितान; काशिराजः - काशिराज;   - भी; वीर्यवान - अत्यन्त शक्तिशाली   

पुरुजित् -पुरुजित्;  कुन्तिभोजः-कुन्तिभोजः;-तथा;शैब्यः-शैब्य;  - तथा;  नरपुङ्गवः - मानव समाज के वीर  । 


इसके साथ ही धृष्टकेतु,चेकितान,काशिराज,पुरुजित,कुन्तिभोज तथा शैब्य जैसे महान शक्तिशाली योद्धा भी है। 



युधामन्युश्र्च विक्रान्त उत्तमौजाश्र्च वीर्यवान  | 

     सौभरो द्रौपदेयाश्र्च सर्व एव महारथाः  ||  ६  || 


युधामन्युः - यधामन्यु;    -  तथा;  विक्रान्तः  -  पराक्रमी;  उत्तमौजाः  -  उत्तमौजा;    -  तथा;  विर्यवान  - अत्यन्त शक्तिशाली;  सौभद्रः  -  सुभद्रा का पुत्र;  द्रौपदेयाः  -  द्रौपदी के पुत्र;  -  तथा;  सर्व  -  सभी;  एव  - निश्चय  ही;  महारथाः  -  महािथी  | 


पराक्रमी युधामन्यु, अत्यन्त शक्तिशाली उत्तमौजा,  सुभद्रा  का  पुत्र  तथा  द्रौपदी  के  पुत्र - ये  सभी महारथी हैं 

अध्याय एक- श्लोक 3 और 4



पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् | 

     व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता || ३ || 


पश्य  -  देखिये;  एतम्  -  इस;  पाण्डु-पुत्राणाम  -  पाण्डु के पुत्रों  की;  आचार्य  -  हे  आचार्य  (गुरु);  महतीम्  - विशाल; चमूम्  - सेना को;  व्यूढां  -  व्यवस्तिथ;  द्रुपद-पुत्रेण  -  द्रुपद के पुत्र द्वारा;  तव  -  तुम्हारे;  शिष्येण  - शिष्य द्वारा;  धी-मता  -  अत्यन्त  बुद्धिमान  । 


हे आचार्य ! पाण्डुपत्रों  की  विशाल  सेना  को  दखे,  जिसे आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपद के पुत्र ने इतने कौशल से व्यवस्तिथ किया है  । 


अत्र श्रुरा महेष्वासा भीमाअर्जुनसमा युधि  | 

     युयुधानो विराटश्र्च द्रुपदश्र्च महारथः  ||  ४  || 


अत्र - यहाँ;  शूरा  -  वीर;  महा-इषु-आसाः-  महान धनुर्धर;  भीम-अर्जुन  -  भीम  तथा  अर्जुन;  समाः  - के समान;  युधि  -  युद्ध मे; युयुधानः  - युयुधान;  विराटः  -  विराट ;  च  -  भी;  द्रुपद -  द्रुपद;  -  भी;  महारथः  - महान योद्धा  ।



इस सेना मे भीम तथा अर्जुन के समान युद्ध करने वाले अनेक वीर धनुर्धर है - यथा महारथी युयुधान, विराट तथा द्रुपद  । 

अध्याय एक- श्लोक 1 और 2

 अध्याय एक : कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण


धतृराष्ट्र उचाव

 धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः|

         मामकाः पाण्डवाश्र्चैव किमकुर्वत सञ्जय || १ ||


धृतराष्ट्र: उचाव - राजा धतृराष्ट्र ने कहा; धर्मक्षेत्रे- धर्मभूमि (तीथणस्थल) मे; कुरुक्षेत्रे कुरुक्षेत्र नामक स्थान में; 

समवेता: -एकत्र; युयुत्सवः - युद्ध करने की इच्छा से;  मामकाः -मेरे पक्ष(पत्रुों); पाण्डवाः - पाण्डु के पुत्रों ने - तथा; एव - निश्चय ही;  किम- क्या; अकुर्वत - क्या किया; सञ्जय - हे सञ्जय ।


धृतराष्ट्र ने कहा -- हे सञ्जय! धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में यद्धु की इच्श्छा से एकत्र हुए मेरे तथा पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?


सञ्जय उवाच

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यढूं दुर्योधनस्तदा |

   आचर्यमुपसङ्गम्य वचनमब्रवीत्|| २ ||


सञ्जयः उचाव - सञ्जय ने कहा; दृष्ट्वा - देखकर; तु- लेकिन; पाण्डव-अनीकम्- पाण्डवों की सेना को; व्यूढम्- व्यहूरचना को; दुर्योधनः- राजा दुर्योधन ने; तदा -उस समय; 

आचार्यम्- शिक्षक, गुरु के; उपसगंमय -पास जाकर; राजा- राजा; वचनम्- शब्द; अब्रवीत्- कहा;


सजंय ने कहा - हे राजन! पाण्डु पुत्रों द्वारा सेना की व्यूहरचना देखकर राजा दुयोधन अपने गुरु के पास गया और उसने ये शब्द कहे।

अध्याय एक - श्लोक 35 और 36

  अपि त्रिलौक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते |          निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीति स्याज्जनार्दन || ३५ ||  अपि –  तो  भी;  त्रै-लोक...