अध्याय एक : कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण
धतृराष्ट्र उचाव
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः|
मामकाः पाण्डवाश्र्चैव किमकुर्वत सञ्जय || १ ||
धृतराष्ट्र: उचाव - राजा धतृराष्ट्र ने कहा; धर्मक्षेत्रे- धर्मभूमि (तीथणस्थल) मे; कुरुक्षेत्रे - कुरुक्षेत्र नामक स्थान में;
समवेता: -एकत्र; युयुत्सवः - युद्ध करने की इच्छा से; मामकाः -मेरे पक्ष(पत्रुों); पाण्डवाः - पाण्डु के पुत्रों ने च - तथा; एव - निश्चय ही; किम- क्या; अकुर्वत - क्या किया; सञ्जय - हे सञ्जय ।
धृतराष्ट्र ने कहा -- हे सञ्जय! धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में यद्धु की इच्श्छा से एकत्र हुए मेरे तथा पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यढूं दुर्योधनस्तदा |
आचर्यमुपसङ्गम्य वचनमब्रवीत्|| २ ||
सञ्जयः उचाव - सञ्जय ने कहा; दृष्ट्वा - देखकर; तु- लेकिन; पाण्डव-अनीकम्- पाण्डवों की सेना को; व्यूढम्- व्यहूरचना को; दुर्योधनः- राजा दुर्योधन ने; तदा -उस समय;
आचार्यम्- शिक्षक, गुरु के; उपसगंमय -पास जाकर; राजा- राजा; वचनम्- शब्द; अब्रवीत्- कहा;
सजंय ने कहा - हे राजन! पाण्डु पुत्रों द्वारा सेना की व्यूहरचना देखकर राजा दुयोधन अपने गुरु के पास गया और उसने ये शब्द कहे।

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