Thursday, August 5, 2021

अध्याय एक - श्लोक 13 और 14


 ततः शङ्खाश्र्च भेर्यश्र्च पणवानकगोमुखाः | 

        सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्ततुमुलोऽभवत् || १३ ||


ततः– तत्पश्चात;  शङखाः– शंख;  – भी; भेर्य–  बड़े-बड़े ढोल,  नगाड़े;  – तथा;  पणव-आनक– ढोल तथा मृदंग;  गोमुखाः– शृंग;  

सहसा– अचानक;  एव– निश्चय ही;  अभ्यहन्यन्त– एक साथ बजाये गये;  सः– वह;  शब्दः– समवेत स्वर;  तुमुल– कोलाहलपुर्ण;  अभवत्–  हो गया  |


तत्पश्चात शंख, नगाडे, बिगुल, तुरही तथा सींग सहसा एक साथ  बज  उठे । वह समवेत स्वर अत्यन्त कोलाहपुर्प  था  |



ततः श्र्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ  | 

       माधवः पाण्डवश्र्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः  ||  १४  ||


ततः–  तत्पश्चात;  श्र्वैतैः–  श्र्वेत;  हयैः–  घोड़ों  से;  युक्ते–  युक्त;  महति–  विशाल;  स्यन्दने–  रथ  में;  स्थितौ– आसीन;  

माधवः–  कृष्ण ने;  पाण्डव–  अर्जुन (पाण्डुपुत्र) ने;  –  तथा;  एव–  निश्चय  ही;  दिव्यौ– दिव्य;  शङखौ–  शंख;  प्रदध्मतुः–  बजाये  | 


दुसरी ओर से श्र्वेत घोडों द्वारा खींचे जाने वाले विशाल रथ पर आसीन कृष्ण तथा अर्जुन ने अपने अपने दिव्य शंख बजाये |  

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