Thursday, August 5, 2021

अध्याय एक - श्लोक 15 और 16


 पाञ्चजन्यं  हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः| 

       पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः || १५ ||


पाञ्चजन्यं–  पाञ्चजन्य नामक;  हृषीकेशः–  हृषीकेश; देवदत्तम्–  दवदत्त नामक शंख;  धनम्-जयःधनञ्जय (अर्जुन धन को जीतने वाला).ने;  

पौण्ड्रम्–  पौण्ड्र नामक शंखदध्मौ–  बजाया;  महा-शङखम्–  भी्म शंख;  भीम-कर्मा–  अतिमानवीय कर्म करने वाले;  वकृ-उदरः–  (अतिभोजी) भीम ने  | 


भगवान कृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त शंख तथा अतिभोजी एवं अतिमानवीय कार्य करने वाले भीम ने  पौण्ड्र नामक शंख बजाया  | 



अनन्तविजयं राजा कुन्तीपत्रो युधिष्ठिरः  | 

           नकुलः सहदेवश्र्च सुघोषमणिपुष्पकौ  ||  १६  ||


अनन्त-विजयं–  अनन्त विजय नाम का शंख;  राजा–  राजा;  कुन्ती-पुत्रः  – कुन्ती के पुत्र;  युधिष्ठिरः– युधिष्ठिर;  

नकुलः-नकुल; सहदेवः– सहदेव ने;  च–  तथा;  सुघोष-मणिपुष्पकौ–  सुघोष तथा मणिपुष्पक नामक शंख;


हे राजन! कुन्ती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपना अनन्तविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने  सुघोष एव मणिपुष्पक शंख बजाया | 

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