Friday, August 6, 2021

आधाय एक - श्लोक 17 और 18

 

काश्यश्र्च  परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः | 

       धृष्टद्युम्नो विराटश्र्च सात्यकिश्र्चापराजितः || १७ ||


काश्यः–  काशी (वाराण्सी) के राजा ने;  – तथा;  परम-ईषु-आसः–  महान धनुर्धर;  शिखण्डी– शिखण्डी ने;  –  भी;  महा-रथः– हजारो से अकेले लड़ने  वाले;  

धृष्टद्युम्नः–  धृष्टद्युम्नः  (राजा  द्रुपद के पुत्र)  ने; विराटः–  विराट राजा ने; –  भी;  सात्यकिः– सात्यकि  (युयुधान,  श्रीकृष्ण के  साथी)  ने;  –  तथा;  अपराजितः–,सदा विजयी; 


महान धनुर्धर काशीराज,परम योद्धा शिखण्डी,धृष्टद्युम्न, विराट,  अजेय सात्यकि ने



    द्रुपदो द्रौपदयाश्र्च  सर्वशः पृथिवीपतः  | 

    सौभद्रश्र्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक्  ||  १८  ||


द्रुपद–  द्रुपद, पंचाल के राजा  ने;  द्रौपदया–  द्रौपदी के पत्रों  ने;  –  भी;  सर्वशः–  सभी;  पृथिवी-पते–  हे राजा;  सौभद्रः–  सुभद्रापुत्र  अभिमन्यु  ने;  –  भी;  महा-बाहुः–  विशाल भुजाओ  वाला;  शङ्खान्–  शंख; दध्मुः -बजाए;  पृथक-पृथक–  अलग  अलग 


द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र तथा सुभद्रा के महाबाहू  पुत्र आदि  सबों ने अपने-अपने शंख बजाये |

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अध्याय एक - श्लोक 35 और 36

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