स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् |
नभश्र्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् || १९ ||
सः– उस; घोषः– शब्द ने; धार्तराष्ट्राणाम्– धृतराष्ट्र के पुत्रों के; हृदयानि– हृदयों को; व्यदारयत्– विदीर्ण कर दिया;
नभः– आकाश; च– शभी; पथिवीम्– पृथ्वीतल को; च– भी; एव– निश्चय ही; तुमुलः–कोलाहलपुर्ण; अभ्यनुनादयन्–प्रतिध्वनित करता |
इन विभिन्न शखों की ध्वनि कोलाहलपुर्ण बन गई जो आकाश तथा पृथ्वी को शब्दायमान करती हुई धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदयों को विदीर्ण करने लगी |
अथ व्यवस्थितान्दृष्टवा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः |
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः |
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते || २० ||
अथ– तत्पशचात्; व्यवस्थितान्– स्थित; दृष्ट्वा– देखकर; धार्तराष्ट्रान्– धृतराष्ट्र के पुत्रों को; कपिध्वजः– जिसकी पताका पर हनुमान अंकित है; प्रवृत्ते– कटिवद्ध; शस्त्र-सम्पाते– वाण चलाने के लिए; धनु– धनुष; उद्यम्य– ग्रहण करके; पाण्डवः– पाण्डुपत्र (अर्जुन) ने; हृषीकेशम्– भगवान कृष्ण से; तदा– उस समय; वाक्यम्– वचन; इदम्– ये; आह– कहे; मही-पते– हे राजा |
उस समय हनुमान से अंकित ध्वजा लगे रथ पर आसीन पाण्डुपुत्र अर्जुन अपना धनुष उठाकर तीर चलाने के लिए उद्यत हुआ | हे राजन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्युह मे खडा देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से ये वचन कहे ।

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