Saturday, August 7, 2021

अध्याय एक - श्लोक 19 और 20

 

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् | 

           नभश्र्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् || १९ ||


सः– उस;  घोषः– शब्द ने; धार्तराष्ट्राणाम्– धृतराष्ट्र के पुत्रों के;  हृदयानि– हृदयों को; व्यदारयत्– विदीर्ण कर दिया;  

नभः–  आकाश;  –  शभी;  पथिवीम्– पृथ्वीतल  को;  – भी;  एव– निश्चय ही;  तुमुलः–कोलाहलपुर्ण; अभ्यनुनादयन्–प्रतिध्वनित करता |


इन विभिन्न शखों की ध्वनि कोलाहलपुर्ण बन गई जो आकाश तथा पृथ्वी को शब्दायमान करती हुई धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदयों को  विदीर्ण करने लगी  |




अथ व्यवस्थितान्दृष्टवा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः  |  

प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते  धनुरुद्यम्य पाण्डवः  | 

        हृषीकेशं  तदा  वाक्यमिदमाह  महीपते  ||  २०  || 


अथ– तत्पशचात्; व्यवस्थितान्–  स्थित;  दृष्ट्वा–  देखकर;  धार्तराष्ट्रान्–  धृतराष्ट्र के पुत्रों को;  कपिध्वजः– जिसकी पताका पर हनुमान अंकित है;  प्रवृत्ते–  कटिवद्ध;  शस्त्र-सम्पाते–  वाण चलाने के लिए;  धनु–  धनुष; उद्यम्य–  ग्रहण करके;  पाण्डवः–  पाण्डुपत्र  (अर्जुन)  ने;  हृषीकेशम्–  भगवान कृष्ण से;  तदा–  उस समय;  वाक्यम्–  वचन;  इदम्–  ये;  आह–  कहे;  मही-पते–  हे  राजा  | 


उस समय हनुमान से अंकित ध्वजा लगे रथ पर आसीन पाण्डुपुत्र अर्जुन अपना धनुष उठाकर तीर चलाने के लिए उद्यत हुआ | हे राजन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्युह मे खडा देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से ये वचन कहे । 

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अध्याय एक - श्लोक 35 और 36

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