Wednesday, August 4, 2021

अध्याय एक - श्लोक 11 और 12

 


अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः | 

        भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि || ११ ||


अयनेषु - मोचों में;    - भी;  सर्वेषु  - सर्वत्र;  यथा-भागम  - अपने-अपने स्थानों पर;  अवस्थिताः  - स्थित; 

भीष्मम्  - भी्ष्म  पितामह की;  एव  - निश्चय  ही;  अभिरक्षन्तू  - सहायता करनी चाहिए;  भवन्तः  - आप;  सर्व  - सब के  सब;  एव  हि  -  निश्चय  ही  । 


अतएव सैन्यव्यूह मे अपने-अपने मोर्चो पर खडे रहकर आप सभी भीष्म पितामह को परी-परी सहायता दें  । 




तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः  | 

सिहंनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्  ||  १२  || 


तस्य– उसका;  सञ्जयनयन– बढाते  हुए;  हर्शम् – हर्ष;  कुरु-वृद्धः– कुरु वंश के वयोवद्ध  (भी्ष्म):  पितामहः– पितामह;  

सिहं-नादम् –  सिंह की सी गर्जना;  विनद्य– गरज कर;  उच्चैः -  उ्च्च स्वर से;  शङखम् – शंख; दध्मौ–  बजाया;  प्रताप-वान्–  बलशाली  |


तब कुरुवशं के वयोवृद्ध परम प्रतापी एवं वृद्ध पितामह ने सिंह-गर्जना की सी ध्वनि करने वाले अपने शखं को उच्च स्वर से बजाया,  जिससे  दुर्योधन  को  हर्ष  हुआ | 

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