योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः |
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेयुद्धे प्रियचिकीर्षवः || २३ ||
योत्स्यमानान्– युद्ध करने वालों को; अवेक्षे– देखुँ; अहम्– मै ; ये– जो; एते– वे; अत्र– यहाँ; समागताः– एकत्र;
धार्तराष्ट्रस्य– धृतराष्ट्र के पुत्र की; दुर्बुद्धे– दुर्बुद्धि; युद्धे– युद्ध मे; प्रिय– मगल; चिकीर्षवः– चाहने वाले |
मुझे उन लोगों को देखने दीजिये जो यहाँ पर धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्र (दर्योधन) को प्रसन्न करने की इच्छा से लडने के लिए आये हुए है।
सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत |
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् || २४ ||
सञ्जयः उवाव– सजय ने कहा; एवम– इस प्रकार; उक्त– कहे गये; हृषीकेशः– भगवान कृष्ण ने ; गुडाकेशेन– अर्जुन द्वारा; भारत– हे भारत के वशंज;
सेनयोः– सेनाओं के; उभयोः– दोनो; मध्ये– मध्य में; स्थापयित्वा– खड़ा करके; रथ-उत्तमम्– उस उत्तम रथ को
संजय न कहा - हे भरतवशी! अर्जुन द्वारा इस प्रकार सम्बोधित किये जाने पर भगवान कृृष्ण ने दोनों दलो के बीच में उस उत्तम रथ को लाकर खडा कर दिया

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