Wednesday, August 11, 2021

अध्याय एक - श्लोक 25 और 26


 भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् | 

           उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरुनिति || २५ ||


भीष्म– भीष्म पितामह; द्रोण– गुरु द्रोण; प्रमुखतः– के  समक्ष;  सर्वेषाम्– सबों  के;  –  भी;  महीक्षिताम्– संसार भर के राजा;  

उवाच–  कहा;  पार्थ– हे पृथा के  पुत्र;  पश्य–  देखो;  एतान्– इन सबों  को;  समवेतान्– एकत्रित;  कुरुन–  कुरुवंश के सदस्यों  को;  इति–  इस  प्रकार ।


भीष्म,  द्रोण  तथा  विश्र्व  भर  के  अन्य  समस्त राजाओं के  सामने  भगवान  ने  कहाँ  कि हे  पार्थ!  यहाँ  पर एकत्र सारे  करुओं को दखो ।




तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः  पितृनथ  पितामहान  | 

आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पौत्रान्सखींस्तथा  | 

      श्र्वशुरान्सुहृदश्र्चैव  सेनयोरुभयोरपि  ||  २६  || 


तत्र–  वहाँ;  अपश्यत्–  देखा;  स्थितान–  खड़े;  पार्थ–  पार्थ ने;  पितृन–  पितरो को;  अथ–  भी; पितामहान–  पितामहों को;  

आचार्यान्–  शिक्षकों को;  मातुलान्–  मामाओ को;  भ्रातृन–  भाइयों को;  पुत्रान्– पुत्रों को;  पौत्रान–  पौत्रों को;  सखीन्–  मित्रों को;  तथा–  और;  

श्र्वशुरान्–  श्र्वसुरों  को;  सुहृदः–  शुभचिन्तको को;  –  भी;  एव–  निश्चय  ही;  सेनयोः–  सेनाओं के;  उभयोः–  दोनो पक्षों की;  अपि–  सहित ।


अर्जुन ने वहाँ पर दोनों  पक्षों  की  सनाओं के मध्य मे अपने चाचा, ताउओं,  पितामहों,  गरुओं,  मामाओं, भाइयों,  पुत्रों,  पौत्रों,  मित्रों,  ससुरों  और  शुभचिन्तकों  को  भी  देखा ।

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