भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् |
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरुनिति || २५ ||
भीष्म– भीष्म पितामह; द्रोण– गुरु द्रोण; प्रमुखतः– के समक्ष; सर्वेषाम्– सबों के; च– भी; महीक्षिताम्– संसार भर के राजा;
उवाच– कहा; पार्थ– हे पृथा के पुत्र; पश्य– देखो; एतान्– इन सबों को; समवेतान्– एकत्रित; कुरुन– कुरुवंश के सदस्यों को; इति– इस प्रकार ।
भीष्म, द्रोण तथा विश्र्व भर के अन्य समस्त राजाओं के सामने भगवान ने कहाँ कि हे पार्थ! यहाँ पर एकत्र सारे करुओं को दखो ।
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृनथ पितामहान |
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पौत्रान्सखींस्तथा |
श्र्वशुरान्सुहृदश्र्चैव सेनयोरुभयोरपि || २६ ||
तत्र– वहाँ; अपश्यत्– देखा; स्थितान– खड़े; पार्थ– पार्थ ने; पितृन– पितरो को; अथ– भी; पितामहान– पितामहों को;
आचार्यान्– शिक्षकों को; मातुलान्– मामाओ को; भ्रातृन– भाइयों को; पुत्रान्– पुत्रों को; पौत्रान– पौत्रों को; सखीन्– मित्रों को; तथा– और;
श्र्वशुरान्– श्र्वसुरों को; सुहृदः– शुभचिन्तको को; च– भी; एव– निश्चय ही; सेनयोः– सेनाओं के; उभयोः– दोनो पक्षों की; अपि– सहित ।
अर्जुन ने वहाँ पर दोनों पक्षों की सनाओं के मध्य मे अपने चाचा, ताउओं, पितामहों, गरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, ससुरों और शुभचिन्तकों को भी देखा ।

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