तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थथितान् |
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् || २७ ||
तान्– उन सब को; समीक्ष्य– देखकर; सः– वह; कौन्तेयः– कुन्तीपुत्र; सवान्– सभी प्रकार के; बन्धून्– सम्बन्धियों को; अवस्थितान– स्थित;
कृपया– दयावश; परया– अत्यधिक; आविष्टः– अभिभूत; विषीदन्– शोक करता हुआ; इदम्– इस प्रकार; अब्रवीत– बोला;
जब कुन्तीपुत्र अर्जुन ने मित्रों तथा सम्बन्धियों की इन विभिन्न श्रणियों को देखा तो वह करुणा से अभिभूत हो गया और इस प्रकार बोला ।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् |
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिश्रुष्यति || २८ ||
अर्जुनः उवाच– अर्जुन ने कहाँ; दृष्टवा– देखकर; इमम्– इन सारे; स्वजनम्– सम्बन्धियों को; कृष्ण– हे कृष्ण; युयुत्सुम्– यद्ध की इ्च्छा रखने वाले; समुपस्थितम– उपस्थित;
सीदन्ति– काँप रहे है; मम्– मेरे; गात्राणि– शरीर के अंग; मुखम्– मुँह; च– भी; पिरशुष्यति– सुख रहा है ।
अर्जुन ने कहाँ – हे कृष्ण! इस प्रकार युद्ध की इच्छा रखने वाले मित्रों तथा सम्बन्धियों को अपने समक्ष उपस्थित देखकर मेरे शरीर के अंग काँप रहे है और मेरा मुँह सुखा जा रहा है ।

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