Wednesday, August 11, 2021

अध्याय एक - श्लोक 27 और 28


 तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थथितान् | 

 कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् || २७ || 


तान्–  उन सब  को;  समीक्ष्य–  देखकर;  सः–  वह;  कौन्तेयः–  कुन्तीपुत्र;  सवान्–  सभी प्रकार के;  बन्धून्– सम्बन्धियों को;  अवस्थितान– स्थित;  

कृपया– दयावश;  परया– अत्यधिक; आविष्टः– अभिभूत; विषीदन्– शोक करता  हुआ;   इदम्–  इस  प्रकार; अब्रवीत–  बोला; 


जब कुन्तीपुत्र अर्जुन ने मित्रों तथा सम्बन्धियों  की  इन  विभिन्न  श्रणियों  को  देखा  तो  वह  करुणा  से अभिभूत  हो  गया  और इस प्रकार बोला ।




अर्जुन उवाच 

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्  | 

         सीदन्ति  मम  गात्राणि  मुखं  च  परिश्रुष्यति  ||  २८  ||


अर्जुनः उवाच–  अर्जुन ने कहाँ;  दृष्टवा–  देखकर;  इमम्–  इन सारे;  स्वजनम्–  सम्बन्धियों  को;  कृष्ण–  हे कृष्ण;  युयुत्सुम्–  यद्ध की  इ्च्छा रखने वाले;  समुपस्थितम–  उपस्थित;  

सीदन्ति–  काँप रहे  है;  मम्–  मेरे; गात्राणि–  शरीर के अंग;  मुखम्–  मुँह;  –  भी;  पिरशुष्यति–  सुख  रहा  है ।


अर्जुन ने कहाँ – हे कृष्ण! इस प्रकार युद्ध की इच्छा रखने वाले मित्रों तथा सम्बन्धियों  को अपने समक्ष उपस्थित  देखकर मेरे शरीर के अंग काँप रहे है और मेरा मुँह सुखा जा रहा है । 

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अध्याय एक - श्लोक 35 और 36

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