वेपथुश्र्च शरीरे मे रोमहर्षश्र्च जायते |
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते || २९ ||
वेपथुः– शरीर का कम्पन; च– भी; शरीरे– शरीर में; मे– मेरे; रोम-हर्षकः– रोमांच; च– भी; जायते– उत्पन्न हो रहा है;
गाण्डीवम्– अर्जुन का धनुष, गाण्डीव; स्त्रंसते– सरक रहा है; हस्तात्– हाथ से; त्वक– त्वचा; च– भी; एव– निश्चय ही; परिदह्यते– जल रही है ।
मेरा सारा शरीर काँप रहा है, मेरे रोंगटे खडे हो रहे हैं, मेरा गाण्डीव धनुष मेरे हाथ से सरक रहा है और मेरी त्वचा जल रही है ।
न शक्नोम्यवस्थात भ्रमतीव च मे मनः |
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव || ३० ||
न– नहीं; च– भी; शक्नोमि– समर्थ हुँ; अवस्थातुम्– खड़े होने में; भ्रमति– भुलता हुआ; इव– सदृशः; च– तथा ; मे– मेरा; मनः– मन;
निमित्तानि– कारण; च– भी; पश्यामि– देखता हुँ; विपरीतानि– उल्टा; केशव– हे केशी असुर को मारने वाले (कृष्ण) ।
मै यहाँ अब और अधिक खडा रहने मे असमर्थ हुँ । मै अपने को भूल रहा हुँ और मेरा सिर चकरा रहा है । हे कृष्ण! मुझ तो केवल अमंगल के कारण दिख रहे है ।

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