Thursday, August 12, 2021

अध्याय एक - श्लोक 29 और 30


 वेपथुश्र्च शरीरे मे रोमहर्षश्र्च जायते | 

        गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव  परिदह्यते || २९ || 


वेपथुः– शरीर का कम्पन;  –  भी;  शरीरे–  शरीर में;  मे–  मेरे;  रोम-हर्षकः–  रोमांच;  –  भी;  जायते–  उत्पन्न हो रहा है;  

गाण्डीवम्–  अर्जुन का धनुष, गाण्डीव;  स्त्रंसते– सरक रहा है;  हस्तात्–  हाथ  से;  त्वक–  त्वचा; –  भी;  एव–  निश्चय  ही;  परिदह्यते–  जल रही  है ।


मेरा सारा  शरीर  काँप  रहा  है,  मेरे  रोंगटे  खडे  हो  रहे  हैं,  मेरा  गाण्डीव  धनुष  मेरे  हाथ  से  सरक  रहा  है  और मेरी त्वचा जल  रही है ।




न शक्नोम्यवस्थात भ्रमतीव च मे मनः  |  

          निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव  ||  ३०  || 


–  नहीं;  –  भी;  शक्नोमि–  समर्थ  हुँ;  अवस्थातुम्–  खड़े होने में;  भ्रमति–  भुलता  हुआ;  इव–  सदृशः;  – तथा  ;  मे–  मेरा;  मनः–  मन;  

निमित्तानि–  कारण;  –  भी;  पश्यामि–  देखता  हुँ;  विपरीतानि–  उल्टा;  केशव–  हे केशी असुर को मारने वाले  (कृष्ण) ।


मै यहाँ  अब और अधिक खडा रहने मे असमर्थ हुँ । मै अपने को भूल रहा हुँ और मेरा सिर चकरा रहा है । हे कृष्ण! मुझ तो  केवल अमंगल के कारण दिख रहे है । 

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अध्याय एक - श्लोक 35 और 36

  अपि त्रिलौक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते |          निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीति स्याज्जनार्दन || ३५ ||  अपि –  तो  भी;  त्रै-लोक...