न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे |
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राजयं सुखानि च || ३१ ||
न – न तो; च– भी; श्रेयः– कल्याण; अनुपश्यामि– पहले से देख रहा हुँ; हत्वा– मार कर; स्वजनम्– अपने सम्बन्धियों को; आहवे– युद्ध मे;
न– न तो; काङ्क्षे– आकांक्षा करता हुँ; विजयम्– विजय; कृष्ण– हे कृष्ण; न– न तो; च– भी; राज्यम्– राज्य; सुखानि– उसका सुख; च– भी
हे कृष्ण! इस युद्ध मे अपने ही स्वजनों का वध करने से न तो मुझे कोई अच्छाई दिखती है और न, मैं उससे किसी प्रकार की विजय, राज्य या सुख की इच्छा रखता हुँ ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा |
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च || ३२ ||
किम्– क्या लाभ; नः– हमको; राज्येन– राज्य से; गोविन्द– हे कृष्ण; किम्– क्या; भोगैः– भोग से; जीवितेन– जीवित रहने से; वा- अथवा; येषाम्– जिनके; अर्थे– लिए; काङ्क्षितम्– इच्छित है; नः– हमारे द्वारा; राज्यम्– राज्य; भोगाः– भौतिक भोग; सुखानि– समस्त सुख; च– भी
हे गोविन्द! हमें राज्य, सुख अथवा इस जीवन से क्या लाभ! क्योंकि जिन सारे लोगों के लिए हम उन्हे चाहते है ।

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