Friday, August 13, 2021

अध्याय एक - श्लोक 31 और 32


 न च  श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे | 

      न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राजयं सुखानि च || ३१ ||


  – न तो;  –  भी;  श्रेयः– कल्याण;  अनुपश्यामि–  पहले  से  देख रहा  हुँ;  हत्वा– मार कर;  स्वजनम्– अपने सम्बन्धियों को;  आहवे– युद्ध मे;  

– न तो;  काङ्क्षे–  आकांक्षा करता हुँ;  विजयम्–  विजय;  कृष्ण–  हे कृष्ण; –  न  तो;  –  भी;  राज्यम्–  राज्य; सुखानि–  उसका  सुख;  –  भी 


हे कृष्ण! इस युद्ध मे अपने ही स्वजनों का वध करने से न तो मुझे कोई अच्छाई दिखती है और न, मैं उससे किसी प्रकार की विजय,  राज्य या सुख की  इच्छा रखता  हुँ ।

 


किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा  | 

      येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च  ||  ३२  || 


किम्–  क्या लाभ;  नः–  हमको;  राज्येन–  राज्य से;  गोविन्द– हे कृष्ण;  किम्–  क्या;  भोगैः–  भोग से; जीवितेन–  जीवित रहने से;  वा-  अथवा;  येषाम्–  जिनके;  अर्थे–  लिए;  काङ्क्षितम्–  इच्छित है;  नः–  हमारे द्वारा;  राज्यम्– राज्य;  भोगाः–  भौतिक भोग;  सुखानि–  समस्त  सुख;  –  भी


हे  गोविन्द!  हमें  राज्य,  सुख  अथवा  इस  जीवन  से  क्या  लाभ! क्योंकि  जिन  सारे  लोगों  के  लिए  हम  उन्हे चाहते  है ।

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अध्याय एक - श्लोक 35 और 36

  अपि त्रिलौक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते |          निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीति स्याज्जनार्दन || ३५ ||  अपि –  तो  भी;  त्रै-लोक...