अपि त्रिलौक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते |
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीति स्याज्जनार्दन || ३५ ||
अपि– तो भी; त्रै-लोकस्य – तीनो लोको के; राज्यस्य– राज्य के; हेतोः– विनिमय में; किम्नु– क्या कहा जाय; मही–कृते– पृथ्वी के लिए;
निहत्य– मारकर; धार्तराष्ट्रान्– धृतराष्ट के पुत्रों को; –नः हमारी; का– क्या; प्रीतिः– प्रसन्ऩता; स्यात्– होगी; जनार्दन– हे जीवों के पालक ।
हे जीवों के पालक ! मैं इन सबों से लडने को तैयार नहीं, भले ही बदलेे मै मुझे तिनों लोक क्यों न मिलते हों, इस पृथ्वी की तो बात ही छोड दे । भला धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें कौन सी प्रसन्नता मिलेगी ?
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः |
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्सबान्धवान्
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव || ३६ ||
पापम् - पाप; एव– निश्चय ही; आश्र्येत– लगेगा; अस्मान– हमको; हत्वा– मारकर; एतान्– इन सब; आततायिनः– आततायियों को;
तस्मात्– अतः; न– कभी नहीं; अर्हाः– योग्य; वयम्– हम; हन्तुम– मारने के लिए; धार्तराष्ट्रान– धृतराष्ट्र के पुत्रों को; स-बान्धवान्– उनके मित्रों सहित;
स्व-जनम्– कुटुम्बियों को; हि– निश्चय ही; कथम्– कैसे; हत्वा– मारकर; सुखिनः– सखी; स्याम– हम होंगे; माधव– हे लक्ष्मीपति कृष्ण ।
यदि हम ऐसे आततायियों का वध करते हैं तो हम पर पाप चढेगा, अतः यह उचित नहीं होगा कि हम धृतराष्ट्र के पुत्रों तथा उनके मित्रों का वध करें । हे लक्ष्मीपति कृष्ण! इससे हमे क्या लाभ होगा ? और अपने ही कुटुम्बियों को मार कर हम किस प्रकार सुखी हो सकते है ?






